हिन्दी भवन में आपका स्वागत है।             नव संवत्सर -2066 समस्त भारतवासियों के लिए मंगलमय हो।             हिन्दी भवन में आपका स्वागत है।             नव संवत्सर -2066 समस्त भारतवासियों के लिए मंगलमय हो।           हिन्दी भवन में आपका स्वागत है।         नव संवत्सर -2066 समस्त भारतवासियों के लिए मंगलमय हो।           हिन्दी भवन में आपका स्वागत है।

 

इंन्टरनेट पर हिन्दी
विदेशों में हिन्दी
हिन्दी सेवी संस्थाएं
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल।
                  ------भारतेन्दु


मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती,
भगवान भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती।
                  -----मैथिलीशरण गुप्त


यदि हिन्दी की उन्नति नहीं होती तो यह देश का दुर्भाग्य है।
                  ------बंकिमचंद्र चटर्जी


हिन्दी विश्व की सर्वाधिक संपन्न भाषा, संस्कृत की ज्येष्ठ पुत्री है।
                  -------विनोबा भावे


यदि भारत में प्रजा का राज चलाना है तो वह जनता की भाषा में ही चलाना होगा।
                  -------काका कालेलकर


संसार में यदि कोई पूर्ण अक्षर हैं तो देवनागरी के हैं।
                  --------आइजक पिटमैन



भारत के बारे में वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्ययन अनिवार्य है।
                  ------- आर.एस.मैकग्रेगर

स्व0 धर्मवीरजी (आई.सी.एस)
( आधारस्तम्भ, हिन्दी भवन)


 
देश की राजधानी के बीचों-बीच स्थापित यह 'हिन्दी भवन' उन तमाम हिन्दीप्रेमियों के उस स्वप्न को साकार करने के लिए निर्मित हुआ है,जिनका हृदय हिन्दी के लिए धड़कता है। जो हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं और हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के प्रति श्रद्धा और सम्मान रखते हैं। जिनके लिए हिन्दी महज एक भाषा नहीं, अपितु देश के सभी भाषा-भाषियों को जोड़ने का एक माध्यम है।

             आइए,यह 'हिन्दी भवन' आप सभी को अपने ऑंगन में जुटने के लिए आमंत्रित करता है। आप किसी भी देश, किसी भी भाषा, किसी भी धर्म और किसी भी विचार के क्यों न हों, अगर आप हिन्दी को प्यार करते हैं, तो फिर देर किस बात की ! जानिए, अपने इस 'हिन्दी भवन' को और तब शायद आप यह भी जान पाएंगे कि हम अपनी भाषा को बिना पहचाने कितने अधूरे होते हैं? संभवतः यही अधूरापन 'हिन्दी भवन' के संस्थापकों को भी सालता होगा, जिन्होंने लगभग पॉंच दशक के निरंतर संघर्ष के बाद 'हिन्दी भवन' को इस योग्य बनाया, जिससे आने वाली पीढ़ी इस भवन के माध्यम से अपनी राष्ट्रीयता, भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़ सके।



                 राष्ट्रीय एकता, भाषायी समन्वय और हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के विकास को समर्पित
'श्री पुरुषोत्तम हिन्दी भवन न्यास समिति' द्वारा संचालित यह 'हिन्दी भवन' एक स्वायत्त संस्था है। हिन्दी भवन किसी सरकारी अनुदान पर आश्रित नहीं है। हिन्दी को प्यार करने वाले समर्थ लोगों के सहयोग से हिन्दी भवन अपनी गतिविधियों को सुचारु रूप से चला रहा है। यदि आप हिन्दी से प्यार करते हैं और हिन्दी भवन से जुड़ना चाहते हैं तो अपना रचनात्मक सहयोग और अमूल्य सुझाव हमें अवश्य भेजें।


संपर्क :-सभागार एवं संगोष्ठी कक्ष हेतु

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